Saturday, June 4, 2011

                                                                  नारी

नारी है ममता की मूरत, उसकी सूरत को देख,
दो फूल श्रद्धा के उसे, तू चढ़ाकर तो देख।
सिमट जाएगा सारा आकाश तेरे आगोश में,
कभी इस नारी को तू आजमा के देख।
दो फूल श्रद्धा के उसे तू..
याद कर हर विपदा में बनी वो तेरा सहारा,
परिवार को तेरे जिसने, अपने हाथों से संवारा,
महज तेरे लिया किया इसने, अपनी इच्छा का दमन,
तेरे जीवन को बना दिया, आज उसने फिर से चमन।
इस चमन की खातिर उसका ना जाने क्या-क्या बलिदान,
सोच की बदले में तूने, उस नारी को क्या दिया?
घृणा, क्रोध, द्वेष अंहकार से ऊपर उठकर देख..
इस नारी में अपना सारा जीवन तेरे नाम किया।
याद कर जब-जब तूने समझा जूती इसे अपने पैरों की,
किस्मत तेरी ही फूटी थी, नहीं थी फूटी गैरों की।
एहसास चाहता है तो तू इसे सीने से लगाके देख
दो फूल श्रद्धा के इसे तू चढ़ाकर तो देख।
ऊपर वाले ने पहले ही इसके साथ अन्याय किया,
इसका कोमल ह्दृय उसने केवल दूजों के लिए दिया।
जब-जब इस नारी के आंचल पे आंच आएगी,
इसके कहर से तू तो क्या दुनिया भी ना बच पाएगी।
नारी रूपी इस दर्पण में तू, अपना भविष्य देख,
दो फूल श्रद्धा के उसे तू चढ़ाकर तो देख।
जहन में ला उस दूब घास को जो इंतजार करती है सिर्फ माहौल का,
और चीरकर धरा को उग्र बन जाती है।
इस दूब घास की जगह तू आज की नारी को देख
दो फूल श्रद्धा के इसे तू चढ़ाकर तो देख।
जब यह करती है कोई वादा, नहीं बदलती अपना इरादा,
पक्के इरादों से इसे तू, अपना बना के देख,
जीवन की इस बगिया में नारी रूपी फूल उगाकर देख। फिर देखना..
इसकी महक किस कद्र तेरे घर को महकाएगी, कुछ ही पलों में किस्मत तेरी फिर से बदल जाएगी।
मनोज कुमार गुप्ता, अलवर राज.

No comments:

Post a Comment