Saturday, June 4, 2011

                                                         यूथ की कहानी

आज के यूथ का मन है ऊबा, पूरब से उगा पश्चिम में डूबा
आज का यूथ है ऐसे जैसे, दुविधाओं से घिरा हो जैसे क्योंकि
मोबाइल है पर चार्ज नहीं है, कहने में कोई हर्ज नहीं है।
जींस है टी शर्ट नहीं है, गाड़ी है पैट्रोल नहीं है।
केवल एक दिल के अलावा इनका कोई मर्ज नहीं है।
लडक़ी है पर दाम नहीं है, इनको कोई काम नहीं है।
चश्मा है पर गलास नहीं है, कॉलेज में इनकी क्लास नहीं है।
अगर साल में एक भी पट गई, तो सोचो की वो गुण कर गई।
सोचो इन दीवानों का हाल रहते हैं ये तंगहाल।
इनके मासूम चेहरों पर अब सिर्फ दया ही आती है,
किस तरह लड़कियां इन सबको अपनी अंगुली पे नचाती हैं।
लडक़ी गर नहीं पटती है तो ये उदास हो जाते हैं।
फिर कॉलेज की मैडम को देख अपना समय बिताते हैं।
क्लास हैं लेते पूरी उनकी, कभी नहीं ये मिस करते,
एक बची है इस कारण हर तरह उसे ये खुश रखते।
यह दर्द नहीं किसी एक का, यह दर्द है सारी कौम का,
दया करो इन यूथ पे कोई, भरो बिल इनके फोन का।
नहीं मानी कोई बात इनकी तो एक यही बीमारी है,
जहर खाने और रेल के नीचे आने की तैयारी है।
करो मदद इन आशिकों की और जीवन में पुण्य कमाओ,
इस तपती दुनिया में तुम भी अपनी आखें सेकते जाओ।
भगवान के इन बन्दों पर, अब तो तुम भी दया करो,
गर्लफ्रेंड से बात करनी है, प्लीज मोबाइल चार्ज करो।
मनोज कुमार गुप्ता, अलवर राज.

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